शहरसे 12 किलोमीटर दूर है ग्राम पानोड़। लहलहाते खेत और खेतों में उड़ते मोर इस गांव की शान हैं। यहां सूर्य उदय के साथ ही मोरों का झुंड घर आंगन में पंख फैलाकर अटखेलियां करने लगता है। ग्रामीणों का मोरों से यह रिश्ता पीढ़ियों पुराना है। यहां मोर हर परिवार का सदस्य हैं। इनके संरक्षण के लिए पूरा गांव एक है। सरपंच ठाकुर कालूसिंह चौहान बताते हैं मोरों से गांव वालों का नाता तीन पीढ़ी से यूं ही चला रहा है।

गांव वाले अपने बच्चे की तरह मोर को पालते हैं। चार साल पहले चने की फसल बोई थी। फसल पर कीटनाशक छिड़कने से एक मोर मर गया और दूसरा बीमार पड़ गया। खेत में तड़पते मोर को ग्रामीणों ने डॉक्टर को दिखाया तो उसने जहर की बात बताई। इसके बाद गांव में चने की फसल के स्थान पर गेहूं बोना शुरू कर दिया ताकि कोई मोर न मरे। दिग्विजय सिंह बताते हैं कि मोरों के लिए हर रहवासी अपने स्तर पर दाना-पानी की व्यवस्था करता है। मोर भी घरों में बेखौफ घूमते हैं। बच्चे तक मोरों को पत्थर नहीं मारते।

शिकार का पता चला तो बंद करा दिया पोल्ट्री फॉर्म

पानोड़ में लगभग 500 मोर हैं। तीन महीने पहले यहां खुले एक पोल्ट्री फॉर्म की आड़ में कुछ लोग मोरों का शिकार करने लगे थे। सात दिन पहले पोल्ट्री फॉर्म संचालक और उसके साथियों को रंगेहाथ शिकार करते पकड़ा तो पूरा गांव एकजुट हो गया। ग्रामीणों ने लसूड़िया थाने का घेराव कर डाला। एकजुटता के साथ पोल्ट्री फॉर्म पर ताला जड़ दिया। विनोद सिंह, नेपाल सिंह और दिग्विजय सिंह ने भास्कर को बताया कि शिकायत पर वन विभाग ने ध्यान नहीं दिया। अब ग्रामीणों ने ठाना है कि वे खुद मोरों का संरक्षण अपने स्तर पर करेंगे।

कितने मोरों का हुआ शिकार, जांचेंगे

ग्राम पानोड़ में मोरों के शिकार की मुझे जानकारी मिली है। हमने एक टीम पूरे मामले की जांच के लिए गांव भेजी है। गांव में कितने मोरों का शिकार हुआ हैं इसकी गहनता से जांच की जा रही है। आरोपियों के खिलाफ वन विभाग भी सख्त एक्शन लेगा। -एकेजोशी, डीएफओ 

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Source: Dainik Bhasker (Dated 02 Mar 2015)