भोपाल । राजधानी के पास स्थित भीमबैठका के शैलाश्रयों की तरह ललितपुर (उप्र) के पास देवगढ़ में गुप्तकालीन बुद्ध प्रतिमाएं मिली हैं, जो कई मुद्राओं में मौजूद हैं। भोपाल की मंदिर सर्वेक्षण परियोजना ने हाल में यहां के शैलाश्रयों में बुद्ध प्रतिमाओं की खोज की है। ललितपुर से करीब 23 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित देवगढ़ गुप्तकालीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन अब तक इन शैलाश्रयों के बारे में जानकारी नहीं थी। बेतवा नदी के किनारे स्थित पहाड़ियों पर यह शैलाश्रय फैले हुए हैं।

इन शैलाश्रयों में शंख लिपि अंकित हैं, जिसके आधार पर ये प्रतिमाएं गुप्तकालीन (4 से 6वीं शताब्दी) की प्रतीत हो रही हैं। इसके अलावा इनकी शैलकला व भाव भंगिमाएं गुप्त कालीन कला से मिलती-जुलती हैं।

गौरतलब है कि बेतवा नदी का उद्गम स्थल कोलार रोड स्थित झिरी में है। जो झिरी से भोजपुर, रायसेन, विदिशा, झांसी से होते हुए देवगढ़ और आगे जाकर यमुना नदी में मिलती है। इस नदी के किनारे स्थित पहाड़ हैं, जो काफी शैलचित्रों से समृद्ध हैं।

वर्षावास के दौरान बने थे आश्रय

पुरातत्वविदों के अनुसार इस तरह के शैलाश्रय बौद्ध भिक्षुओं द्वारा वर्षावास के दौरान अपने आश्रय के उपयोग में लाए गए हैं, क्योंकि इन शैलाश्रयों में इनके चिनाईदार पत्थरों से पाटे गए हैं। इनको बाहर से जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए दीवार भी बनाई गई है।

इनसे समानता

देवगढ़ में मिली बुद्ध की आकृतियों के साथ स्तूप, बौद्ध अवशेषों व अभिलेखों में भोपाल से लगे भीमबैठका, पंगूरारिया, पारूमास की कोठरी, लाखजवार, विनैका, तालपुरा, खरबई, बरहट, नरसिंहगढ़ आदि में मिले शैल चित्रों व प्रतिमाओं से मिलते जुलते हैं। सभी एक ही काल में बने हैं।

यह है खास

देवगढ़ में मिली बुद्ध की विभिन्न् मुद्राओं में प्रतिमाएं हैं। इनमें अभय मुद्रा, वरद मुद्रा, धरमचक्र प्रवर्तनमुद्रा, भूमि स्पर्श मुद्रा खास हैं। इसके अलावा शैलाश्रयों में शिवलिंग सहित चित्रकारी भी की गई है।

आगे क्या

इन शैलाश्रयों को संरक्षित करने और ज्यादा अध्ययन के लिए एएसआई की भोपाल मंदिर सर्वेक्षण परियोजना अब लखनऊ रीजन को लिखने की तैयारी मे है। यह स्थान पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

गुप्तकालीन प्रतिमाएं

'देवगढ़ में बेतवा नदी के किनारे मिले बुद्ध मूर्तियां व शैलचित्र गुप्तकालीन हैं। जो भोपाल से लगे भीमबैठका सहित अन्य स्थानों के शैलचित्रों व प्रतिमाओं से समानता रखते हैं। इनको संरक्षित करने के लिए लखनऊ सर्किल को लिखा जाएगा।"

-डॉ. एसएस गुप्ता, अधीक्षण पुरातत्वविद, मंदिर सर्वेक्षण परियोजना, उत्तरक्षेत्र भोपाल


Source: Nai Dunia (Dated 21 Mar 2014)