प्रस्तावना-

प्राचीन काल से मानव जाति को बाढ की आपदा का सामना करना पड ता रहा है। प्राचीन समय में इस आपदा को प्रकृति प्रदत्त आपदा के रुप में स्वीकार किया गया था। शनैः शनैः विकास चक्र में बाढ को नियंत्रित करने की कार्यवाही को अपनाने की आवश्यकता को स्वीकार किया गया। मानव आबादी की वृद्धि के साथ यह आपदा विकराल रुप धारण करती जा रही है। पूर्व समय में नदियों की गहराई तथा आबादी फेैले हुए रुप में बसने की स्थिति के कारण बाढ से क्षति का क्षेत्र सीमित रहता था। जनसंख्या की वृद्धि के कारण जहां एक ओर नदी के आस पास भी मनुष्यों को बसने पर विवश होना पडा है, वहीं दूसरी ओर नदियों की गहराई कम होने के कारण नदी के पाटो का फैेलाव बढ गया है। तेजी से बढ ता शहरीकरण, वनों की कटाई तथा प्राकृतिक जल निकास की रुकावट एवं प्राकृतिक घास के मैदानों की कृषि भूमि में तब्दीली आदि कारणों से बाढ की संभावनाओं में वृद्धि हुई है। विविध कारणों से बाढ की स्थिति निर्मित होने की दशा में जन हानि, पशुहानि एवं सम्पत्तियों की क्षति के बचाव के लिये बाढ प्रबंधन योजना को तैयार करने की आवश्यकता है। आपदा प्रबंधन योजना के माध्यम से शासन के संबंधित विभाग तथा अशासकीय स्वैच्छिक संस्थानों की भूमिका को संभावित आपदा कीे पूर्व की तैयारियों तथा आपदा के पश्चात के बचाव कार्य एवं भविष्य के रोकथाम के उपायों को चिन्हांकित करना है। चरणबद्ध रुप से की जाने वाली कार्यवाहियों को निर्धारित करने से बाढ की त्रासदी के प्रभाव को कम करने में सहायता प्राप्त होगी।

बाढ की परिभाषा -

अन्तर्राष्ट्रीय सिंचाई जल प्रवाह आयोग के अनुसार बाढ मूलतः नदी-नालों में जल प्रवाह का वह आधिक्य है, जो सामान्य स्थिति को छोड कर, प्राकृतिक किनारों या मानव निर्मित किनारों (बंधान) के ऊपर से बहता है, जिसके कारण निचले क्षेत्र पानी से घिर जाते हैं जल स्तर का बढना तथा आबादी, कृषि भूमि, सम्पत्तियों का डूब जाना बाढ के प्रभाव की श्रेणी में आता है।

बाढ केे कारण    

बाढ की स्थिति निर्मित होने के कई मूलभूत कारण है, जिसका सबसे प्रमुख कारण मौसम के स्वरुप में आकस्मिक परिवर्तन होना है। सामान्य वर्षा से अधिक वर्षा या कुछ समय तक नियमित रुप से अधिक वर्षा या दोनो का एक साथ होना भी बाढ की स्थिति निर्मित करता है। हिम क्षेत्रों में बर्फ से पिघलकर जल वर्षा जल के साथ मिलकर जल स्तर को उपर करता है। अधिक वर्षा के होने पर बांधों का जल संग्रहण क्षेत्र पूरा भर जाने के पश्चात आधिक्य के जल को बांधों से छोड ने पर भी बाढ आती है। बाढ की स्थिति निर्मित होने के कारण निम्नानुसार है:-

1.
नदी नालों के प्राकृतिक किनारों से ऊपर जल प्रवाह की स्थिति।

2.
वनों की कटाई।

3.
नदियों की गहराई में कमी।

4.
सहायक नदियों का जल सामान्य से अधिक मात्रा में मुख्य नदी में मिलने की स्थिति।

5.
भूकम्प एवं भूस्खलन नदी के क्षेत्र में होने की स्थिति में।

6.
कृत्रिम रुप से नदी के प्रभाव को कतिपय कारणों से रोकने के फलस्वरुप जैसे-बडे पुलों का निर्माण या रेल्वे गेट आदि।

7.
सामान्य से अधिक वर्षा या कुछ समय के लिये लगातार अधिक वर्षा।

8.
जल निकासी के कमजोर अधोसंरचना वाले क्षेत्रों में अधिक वर्षा।

9.
बांधों का टूटना।

10.
बाढ नियंत्रण योजना के अंतर्गत निर्मित बंधानों का टूटना।

11.
तेज हवाओं के चलने के कारण तूफान जैसी स्थिति बनना आदि।

12.
मौसम में आकस्मिक परिवर्तन।

13.
प्राकृतिक जल निकासी में मानव निर्मित बाधायें।

 बाढ प्रबंधन योजना कोे तैयार करने का उद्देश्य

राज्य की बाढ प्रबंधन योजना का मुख्य उद्देश्य बाढ से निपटने के लिये सुरक्षात्मक उपायों की योजना बनाना, प्रमुख नदियों पर बांधो से पानी छोडने के लिये समन्वित जल प्रबंधन योजना तथा बाढ की स्थिति में बचाव कार्य एवं राहत तथा पुनर्वास कार्यों की योजना को निर्धारित करना है राज्य स्तरीय आपदा प्रबंधन योजना के दिशा निर्देशों के आधार पर प्रत्येक जिले द्वारा उनके जिले के क्षेत्र हेतु बाढ प्रबंधन योजना तैयार की जानी चाहिये।



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Source: www.relief.mp.gov.in